Sunday, April 07, 2013

master & his disciple

हज़रत निजाम्मुद्दीन औलिया जी एक शिष्य था ,  उस शिष्य का नाम था अबुल हसन यमीनुद्दीन था । औलिया साहिब का एक शिष्य बेहद धनवान था . पैसा तथा जमीन जायदाद की कोई कमी न थी . वह धनवान व्यापारी था जो कि यहाँ से सस्ता सामान ऊन्ठों पर लाद कर अफ़ग़ानिस्तान तथा उससे भी आगे के देशों में ले जाकर बेचता तथा वहां से मिलने वाला सस्ता सामान यहाँ लाकर बेचता , यानि कि उसका आयात -निर्यात का कारोबार था 
एक दिन की बात है कि औलिया साहिब का एक शिष्य उनके पास . वह शिष्य बेहद गरीबी से जूझ रहा था . उसकी बेटी की शादी तय हो चुकी पर शादी पर खर्च करने लायक पैसों का इंतजाम न हो पाया था . औलिया साहिब के पास बहुत उम्मीद लेकर पहुंचा था वह . शिष्य ने आकर मदद के लिए फ़रियाद की . औलिया साहेब के पास उन दिनों तंगहाली चल रही थी . वह बड़ी मुश्किल से अपने लिए खाने इत्यादि का इंतजाम कर पा रहे थे . औलिया साहिब ने उसे कुछ रुकने की सलाह दी , क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि कहीं न कहीं से इंतजाम हो ही जायेगा . उनके पास कई शिष्य आते थे जो कि उनकी सेवा में कोई न कोई भेंट दिया करते थे . इसी उम्मीद पर ही उन्हों ने शिष्य को रुकने की सलाह दी पर होना तो कुछ और ही था . जब शादी को कुछ ही दिन रह गए तब शिष्य ने वापिस जाने की आज्ञा मांगी . शिष्य  बहुत दुखी क्योंकि उसने देखा कि औलिया साहिब बहुत मश्किल में अपने लिए ही इंतजाम कर पा रहे थे . औलिया साहिब भी बहुत परेशान थे , क्योंकि चाहते हुए भी उस शिष्य की मदद न कर पा रहे थे . शिष्य द्वारा जाने की आज्ञा मांगने पर वह उसे और रुकने को भी नहीं कह पा रहे थे क्योंकि शादी को कुछ ही दिन शेष थे . 
शिष्य वापिस चलने को तैयार हो गया तो औलिया साहिब ने उससे मदद न कर पाने के लिए माफ़ी मांगी तथा कहा ," मेरे पास तुझे देने को कुछ भी नहीं है , पर तू  खाली हाथ न जा , तू बहुत उम्मीद लेकर मुर्शिद के दरवाज़े पर आया है . इस वक़्त मेरे पास मेरे ये जूते ही हैं , तू इसी को ले जा , खुदा  तेरा मददगार होगा ." औलिया साहिब ने वे जूते उतार कर शिष्य के हाथ में दे दिए . जूते जगह जगह से कटे फटे थे , जो कि पहनने लायक भी न थे .  शिष्य ने जूते लेकर बड़े बे मन से अपने थैले में रख लिए और चल दिया अपने गावं की और . 

शिष्य को चलते चलते एक दो दिन ही हुए होंगे अभी उसका गावं दूर था । 
दूसरी तरफ औलिया साहिब का धनवान शिष्य इक्कीस उन्ठों पर काजू, बादाम , मेवे इत्यादि लाद कर अफगानिस्तान से आ रहा था .  उसे हल्की हल्की खुशबु सी महसूस हो रही थी . उसका ध्यान खुशबु की तरफ आकृष्ट हो रहा था . उसने खुशबु को पहचानने की कौशिश की तो उसे महसूस हुआ , "कि खुशबु तो मेरे मुर्शिद की ही लग रही है ." जैसे जैसे उसका काफिला आगे - आगे बढ़ रहा  था खुशबु भी बढती जा रही थी . उसके मन में मस्ती छाने लगी . अपने मुर्शिद [गुरु ]के प्रति प्रेम जाग उठा और उसका मन मयूर की तरह नाचने लग गया  . अश्रुधारा बह उठी . वह गरीब  शिष्य जो की औलिया साहिब के दर से आ रहा था वह उसी काफिले के पास से गुज़र रहा था वह थोडा आगे बढ़ा तो धनवान शिष्य ने महसूस किया कि खुशबु घटने लग रही है . वह समझ गया कि यह जो फटेहाल पास से गुज़रा है , यह खुशबु वहीँ से आ रही है . उसने काफिला रुकवा लिया और भागता हुआ उसी फटेहाल गरीब व्यक़्ति के पास पहुँच गया . अब वहां ऐसा लगने लगा जैसे खुशबु का  सैलाब ही आ गया हो उस धनवान की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी . मुर्शिद के प्रति प्रेम का अथाह सागर हिलोर उठा उसने दोनों हाथ जोड़ कर उस फटेहाल व्यक़्ति से पूछा , " आप कहाँ से आ रहे हो ? " 
" मैं अपने मुर्शिद के दर से आ रहा हूँ ". 
" मुर्शिद " शब्द सुनते ही वह धनवान आनंद से झूम और पूछा , " कौन हैं आपके मुर्शिद ? "
उसने जवाब दिया , " औलिया साहिब हैं , उनका नाम है निजाम्मुद्दीन साहिब  है ".
अब क्या था , उस धनवान व्यापारी को अपना गुरु भाई मिला और वह प्रसन्ता से झूम उठा .व्यापारी ने उसे अपने गले से लगा लिया और वहां का हाल जानने को कई सवाल किये . . उस शिष्य से यह  जानकर कि मुर्शिद तो बहुत ही तंगहाली से दिन काट रहे हैं , वह बहुत दुखी हुआ . उसे अपने पर बहुत लाज आयी , मन ने कहा , " धिक्कार है मुझ पर कि मैं तो मजे से हूँ और मेरा मुर्शिद ---------"मेरा मुर्शिद मेरे इस गरीब गुरु भाई की मदद भी न कर सके . उसकी रूह काँप उठी उसने अपने गरीब गुरु भाई से पुछा ," क्या ये जूते आप मुझे देंगे " ? अब वह गरीब गुरु भाई सोचने लगा कि ," मेरे तो किसी काम के नहीं  , न ये पहनने लायक और न ही ये बिकने वाले , इसी को दे देता हूँ , मुझसे तो इनकी संभाल भी हो सकेगी  फिर ये है भी श्रद्धावान ।" . यह सॉच कर उसने जूते अमीर के हवाले कर दिए . जूते पाकर वह धनवान व्यापारी नाचने लग गया . उसने जूते अपने सर पर रखे , कई बार उन्हें चूमा और अपने उस गरीब गुरु भाई से कहा ," मैं तो आपका यह क़र्ज़ कभी उतार ही न पाऊंगा , मैं अपनी सारी दौलत  भी अगर इन जूतों के बदले में दे दूं तो भी आपका क़र्ज़ मुझसे न उतर पायेगा . इस वक़्त मेरे पास इक्कीस उन्ठों पर बादाम मेवे इत्यादि लदे  हैं . इनमे से मैं आपको बीस ऊंट दे रहा , आप इन्हें कबूल करें " .और उस धनवान ने लाखों के सामान सहित बीस ऊँट अपने गरीब गुरु भाई के हवाले कर दिए .
अब एक ऊँट सामान सहित लेकर तथा मुर्शिद के जूते अपने सर पर रखे वह गुरु के गुण गाता हुआ वह अपने गुरु हज़रत निजाम्मुद्दीन औलिया साहिब जी के पास पहुँच गया . एक ऊंट सामान सहित गुरु को भेंट किया तथा उनके जूते उनके सामने रख दिए 
मुर्शिद के पूछने पर उस धनवान शिष्य ने रास्ते में गुजरी पूरी दास्तान सुना दी . पूरी बात सुन कर औलिया साहिब ने कहा " यह जूते तो तूने बहुत सस्ते में ले लिए हैं ,तू दौलत से तो अमीर है ही तू दिल से भी अमीर है , चल आ बैठ मेरे सामने , आज मैं तेरे को आत्मा से भी अमीर बना दूं , आज मैं तुझे वह दौलत देता हूँ जो कभी ख़त्म ही न होगी . बांटे जाना इस दौलत को , जैसे जैसे बांटेगा ,यह दौलत बढती ही जाएगी  . उन्होंने उस शिष्य को अपने सामने बैठाया और परमात्मा के घर की दौलत से मालामाल कर दिया 
" तू आज असली अमीर हुआ है , दुनिया की सारी अमीरी यहीं रह जाएगी पर जो अमीरी मैंने तुझे दी है यह तेरे साथ ही जाएगी अब तुझ में और मुझमे कोई फर्क नहीं रहा अब हम दोनों एक ही हैं . पहला जो तेरा नाम ,इस शरीर को मिला वह तेरे माता पिता ने दिया था . मैं आज तुझे नया नाम दे रहा हूँ ,दुनिया में तू इसी नाम से याद किया जायेगा . और जो नाम औलिया साहिब ने उसे दिया , वह शिष्य आज तक उसी नाम से जाना जाता है और वह नाम आज तक लोगों की जुबान पर है .
अमीर खुसरो नाम दिया गया मुर्शिद के द्वारा .







Wednesday, March 27, 2013

return to home

बहुत भयंकर  तूफान में घिरा हुआ एक जहाज समुद्र में जा रहा था । दूर दूर तक कोई किनारा नज़र न आ रहा था । सभी की निगाहें आकाश की तरफ उठी हुई थीं । शायद प्रभु से कोई आस लगा राखी थी । जहाज़ का कप्तान देख रहा था , कहीं कोई टापू , कोई पेड़ या कोई कोई उड़ता हुआ पंछी ही नज़र आ जाए ताकि जीवन की डूबती हुई आशा को किनारा मिल सके । धीरे धीरे जहाज़ डूबता हुआ डूब ही गया । 
उसी जहाज़ पर सवार दो व्यक्ति जिनकी जहाज़ पर ही मित्रता जहाज हुई थी एक साथ ही दो दिन और दो रात तैरते रहे । अपने अपने जीवन की आस छोड़ चुके दोनों मित्रों को काफी दूर आकाश में कुछ पक्षी उड़ते हुए दिखाई दिए । अंदाजा लगाया कि कहीं पास में ही धरती का टुकड़ा होगा अवश्य । तैरने की भी हिम्मत न थी । बहुत दूरी पर कुछ पेड़ दिखाई देने लगे दोनों मित्र जीवन की आस त्याग चुके थे , फिर हिम्मत बंधी और हिम्मत कर वहीँ पहुँच गए जहाँ पेड़ -पौधे लह लहा रहे थे । 
दोनों किनारे लगे । वहीँ से कुछ फल आदि तोड़ कर खाए और आराम किया । अपनी नींद पूरी की और दोनों ने  वहां का निरीक्षण किया । एक दिन के निरीक्षण के बाद पाया कि वह एक छोटा सा टापू था । वहीँ किनारे बैठ कर कुछ दिन  इंतजार करते रहे कि शायद कोई जहाज निकलता हुआ दिखाई दे । पर लगता था कि जहाज शायद उस तरफ कभी आते ही न थे । 
दोनों मित्रों ने पाया कि वहां कोई हिंसक पशु न थे इसी लिए वे बिना किसी डर के अकेले भी घूमने को निकल जाते थे । 
उन दोनों मित्रों में एक का नाम था जगत लाल  और एक का नाम था राम लाल । 
वहां कोई काम तो था नहीं , इस लिए दोनों मित्र भगवान से प्रार्थना करने में भी समय व्यतीत करने लगे । जगत लाल प्रभु से प्रार्थना करता की ," हे प्रभु तुने ही यहाँ पटका है , अब मेरी मदद भी कर । मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे ऐसी शक्ति दो कि मैं यहाँ पर अपने रहने लायक जगह बना लूं , खेती बाड़ी कर लूं तथा रहने लायक मकान भी बना लूं ।"  प्रभु ने उसकी मदद की , उसे बुद्धि दी , उसने पत्थरों इत्यादि से औज़ार बनाये और खेती बाड़ी शुरू कर दी । एक दिन उसने पत्थरों आदि से  मकान भी बना लिया । जब उसका मकान बन गया तो जगत लाल ने भगवन से प्रार्थना की , कि ,"प्रभु मेरा मकान बन गया है , अब कृपा करके इस मकान को घर बना दो क्योंकि मेरा मकान वीरान है ,घर बन गया तो वीरानी अपने आप दूर हो जाएगी । प्रभु ने एक दिन उसकी प्रार्थना को सुना ।  ,एक औरत एक दिन तैरते हुए वहीँ किनारे पर आ लगी । उसने बताया कि वह अपने परिवार सहित विश्व यात्रा पर निकली थी । यहाँ से काफी दूर उनका जहाज़ भयंकर तूफ़ान की वज़ह से डूब गया और वह अकेली ही बची है । जगत लाल तथा राम लाल ने उसे सांत्वना दी , कुछ खाने को दिया । वह औरत बहुत थकी हुई थी इस लिए जल्दी सो गयी । जगत लाल जो रोजाना प्रभु से अपना घर बसाने के लिए प्रार्थना करता था , कहने लगा कि ," प्रभु ने मेरी सुन ली , शायद इसी लिए उसने ही इसे मेरा घर बसाने को मेरे लिए ही भेजा है । " राम लाल ने उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा ," वह सबकी सुनता है और हर इच्छा पूरी करता है , शायद उसी ने इस औरत को तेरे लिए ही भेजा है , अब तू अपना घर बसा । मुझे तो यहाँ नहीं रहना , मुझे तो अपने घर वापिस जाना है , क्योंके  यह पराया इलाका ,परायी जगह और पराया देश है , मुझे तो अपने वतन ही वापिस जाना है ,  मैं तो वहीँ वापिस जाने के लिए ही प्रार्थना करता हूँ । वह मेरी भी एक दिन जरूर सुनेगा , वह सबकी सुनता है । जगत लाल की प्रार्थना सुनी गयी और उसकी हर आस पूरी हुई खेती बाड़ी मकान इत्यादि उसने सब कुछ बनाया , अपना घर भी बसाया ,और बाल बच्चे भी हो गए । 
दूसरी तरफ राम लाल हर पल प्रभु से अपने घर वापिसी के लिए प्रार्थना करता । एक दिन उसकी भी सुनी गयी । काफी दूरी से एक जहाज जा रहा था राम लाल ने एक बहुत बड़ी झाड़ी को उखाड़ कर ऊंचा कर हिलाना शुरू कर दिया । जहाज़ पर सवार कुछ यात्रियों की नज़र पड़ी , कप्तान को सूचित किया गया कप्तान ने जहाज़ रुकवा कर एक जीवन रक्षक नाव को टापू की तरफ रवाना किया । नाव टापू के किनारे आ लगी । राम लाल ने नाविक को अपने साथ घटी सारी घटना बतायी । नाविक ने उसे वापिस चलने के आश्वासन के साथ ही वापिस चलने को कहा । राम लाल ने जगत लाल तथा उसके परिवार से भी कहा ,"बहुत अच्छा मौका है ,आप भी वतन वापिस चलें " पर जगत लाल ने उत्तर दिया ," मेरा घर तो अब यहीं बस गया है , कहाँ जाऊं अब ? मैं तो यहीं रहूँगा । राम लाल के समझाने पर भी वह वह वापिस चलने को तैयार न हुआ । राम लाल अकेला ही उस नाविक के साथ गया और उस जहाज़ पर चढ़ कर अपने वतन की ओर चला गया और एक दिन अपने घर पहुँच गया । अपने घर पहुँच कर ही उसे प्रसन्नता मिली । 
आईये इस कहानी को समझने की कौशिश करें । इस कहानी में जो टापू है , वह है हमारा मात लोक , यहाँ आकर सभी फसे हुए हैं और सभी यहाँ दुःख उठा रहे हैं ,पर फिर भी यहाँ से वापिस अपने घर नहीं जाना चाहते । कारण इस संसार जगत  का मोह नहीं टूट ता । 
इस कहानी में " अपना घर , अपना देश तथा अपना वतन " जो है वो है परम पिता परम आत्मा का घर जिसे सत लोक या सचखंड भी कहते हैं 
इस कहानी में जो नाव है वह है किसी संत महापुरुष की कृपा । और जो जहाज़ है वह है " नाम " ,जिसे किसी संत महापुरुष से ही प्राप्त किया जा सकता है । किसी महापुरुष ने इसे दीक्षा कहा है तो किसी ने उपदेश । इसी लिए बाबा नानक ने कहा ,"नानक नाम जहाज़ है , चढ़े सो उतरे पार " । जो इस जहाज़ पर चढ़ जाते है वे अपने घर , अपने वतन अपने देश वापिस पहुँच जाते हैं । इस कहानी में जो नाविक है वह है अपना कोई सत्संगी जो कि जहाज़ पर चढाने में काफी मददगार होता है । इस कहानी में जहाज़ का कप्तान जो है वह है कोई पूर्ण संत महापुरुष । 
 जगत लाल जो है वो है इस संसार जगत से प्यार करने वाला तथा राम लाल है परमात्मा से प्यार करने वाला मुझे उम्मीद है कि आप इस कहानी को समझने की पूरी कोशिश करेंगे । 
धन्यवाद । 



Sunday, March 24, 2013

jeevit marna bhavjal tarna

एक समय की बात है कि एक पूर्ण संत महापुरुष जी के आश्रम में उन्ही के साथ रह रहे एक शिष्य ने अपना शरीर त्याग दिया .अभी शिष्य की साधना पूर्ण न हुई थी, उसे बाकी साधना पूरी करनी थी .पूर्ण संतो के शिष्यों को  अगला जन्म भी मनुष्य का ही मिलता है , पर उस शिष्य को अगला जन्म तोता का मिला , कारण था कि अंत समय उसका ध्यान एक तोते की तरफ था . संत जी ने अपनी दिव्यद्रिष्टी द्वारा तोते का जन्म लिए अपने शिष्य पर नज़र रखनी शुरू कर दी . तोता बना हुआ शिष्य एक धार्मिक व्यक्ति द्वारा  बाज़ार से   खरीद लिया गया व पिंजरे में बंद हो गया . संत जी तोता बने अपने शिष्य को ढूँढ़ते ढूँढ़ते वहीं पहुँच गये जहाँ वह पिंजरे में बंद था . गुरु महाराज ने देखा कि शिष्य [तोता ] बहुत प्रसन्न था .गुरु जी अपने शिष्य [ तोता ] पर दया दृष्टि डाली .शिष्य के  ज्ञान पर माया द्वारा डाला गया आवरण हट गया और उस तोता बने शिष्य को गुरु द्वारा द्वारा दिया गया सारा ज्ञान और उपदेश याद आ गया . शिष्य ने अपने गुरु को पहचान लिया .इतने मे ही घर का मालिक आया , उसने देखा कि उसके द्वार पर महात्मा खड़े है . घर का मालिक धार्मिक तो था ही , वह महात्मा जी को आदर सत्कार सहित घर के भीतर ले गया और एक आसन पर बिठाया . परिवार के अन्य सदस्य भी आ गए और धर्म चर्चा आरम्भ हुई . घर के मालिक ने पूछा कि "जन्म -  मृत्यु के बंधन कैसे कट सकते है , तथा किस उपाए से आत्मा  आजाद होकर अपने मालिक परम पिता परमात्मा से मिल सकती है ? "महात्मा जी ने उत्तर दिया " यह तो एक बहुत ही आसान  सी साधना द्वारा हो जाता है ". घर के मालिक ने कहा " आप वह साधना हमें भी बता दीजिये " . महात्मा जी ने कहा " यह तो बहुत ही सरल सी बात है मै क्या उत्तर दूं अपने तोते से ही पूछ लो , वह जानता है " .घर के सभी सदस्य बहुत हैरान हुए . महात्मा जी के कहने पर सभी वहां पहुचे जहाँ तोता पिंजरे में बंद था . महात्मा जी के कहने पर घर के मालिक ने तोते के सामने खड़े होकर दोनों हाथ जोड़ कर पूछा " मनुष्य कैसे जन्म मरण के बंधन काट कर अपने मालिक परम पिता परमात्मा को पा सकता है ? " यह सुनते ही तोता अचेत होकर पिंजरे में गिर गया . उसे पिंजरे से बाहर निकाला गया . उसकी गर्दन लटक गयी . उसे मरा मान कर घर के बाहर रख दिया गया . जैसे ही घर के सदस्य घर के भीतर जाने लगे तोता फुर्र से उड़ गया और सभी देखते रह गए . इस पर महात्मा जी ने उनसे पूछा , "क्या तुम्हे अपने प्रश्न का उत्तर मिला ? "सभी ने न  मे सिर हिला दिया   गुरु महाराज ने कहा " तुमने देखा कि तोता मरा नहीं था पर जीते जी मृत्यु के अभ्यास द्वारा वह इस लोहे के पिंजरे से आजाद हुआ  , इसी प्रकार जो जीव आत्मा जीते जी मरने की कला को सीख लेता है वह जन्म तथा मृत्यु के बंधन काट कर काल के बंधन से आजाद हो कर परम पिता परमात्मा को पा लेने का अधिकारी होता है " .तत्पश्चात घर के सभी सदस्यों ने जीते जी मरने की कला के रहस्य को समझा तथा स्वयं को धन्य माना .

Sunday, March 17, 2013

natural wonders


  1. आस्ट्रिया के टौर्न पर्वत से नोद्रम नामक एक झरना बहता है । हर तीसरे पहर ३. ३ ० बजे  उस पर एक इंद्र धनुष उदित होता है । यह समय इतना निश्चित है कि लोग इस से अपनी घडी मिलाते हैं । 
  2. इटली के आर्मिया क्षेत्र में एक जल स्रोत है । उसमे सर्दियों के मौसम में गर्म पानी निकलता है , भाप के बादल तक उठते हैं , और गर्मियों मैं उसका पानी बर्फ जैसा ठंडा होता है । 
  3. उरूत्सी झील तिब्बत में है इसका पानी बारह वर्ष खारा रहता है और फिर बारह वर्ष मीठा यह क्रम सदियों से चला आ रहा है । 
  4. इटली के टोरंटो क्षेत्र के समीप एक समुद्र है , समुद्र का पानी तो खारा है , समुद्र के बीच में एक फव्वारा है  जिसका रंग सफ़ेद है तथा पानी बेहद मीठ है । 
  5. एविग्नान में सोराग्यू नदी के तट पर अंजीर का एक बहुत बड़ा पेड़ है प्रति वर्ष मार्च के महीने में इसका जल स्तर बढ़ने लगता है ।  नदी का जल स्तर ऊंचाई पर स्थित अंजीर के पेड़ की तरफ उलटी दिशा में बहता है । जल स्तर तब तक बढता है जब तक अंजीर के पेड़ को छू न ले । पेड़ का चरण स्पर्श करते ही जल स्तर गिरने लगता है तथा स्तिथि सामान्य हो जाती है । 
  6. आयर लैंड के अप्ट्रिल प्रदेश में लोधारिना नामक एक बहुत बड़ी झील है । यह लबालब भरी रहती है । कभी कभी इसका सारा पानी गायब हो जाता है पता ही नहीं लगता है कि पानी कहाँ अदृश्य हो गया । वैज्ञानिक खोज मुद्दतों से चल रही है , कोई निष्कर्ष नहीं  । 
  7. सन ६ ६ ० में चीन ने कोरिया पर आक्रमण कर दिया । कोरिया का राजा बंदी बना लिया गया । राजा की ७ १ रानियों ने कोरिया में बह रही कोयम नदी नाक्वय्म नामक चट्टान पर चढ़ कर नदी में कूद कर आत्महत्या कर ली । इस घटना को १ ४ ० ० वर्ष बीत चुके हैं । तब से लेकर आज तक इस नदी के किनारे एक ही किस्म के ७ १ पौधे एक साथ उगते है । इन पौधों में एक साथ ७ १ कलियाँ उगती हैं और एक साथ ही ७ १ फूलों के रूप में खिलती हैं   । ठीक जिस दिन रानियों ने आत्महत्या की थी उसी दिन यह फूल खुद ब खुद नदी में गिर जाते हैं ।  यहाँ इस घटना को देखने के लिए हजारों लोगों के साथ वैज्ञानिक भी पहुँचते है ।  अनेकों परीक्षणों के बाद भी कोई नतीजा नहीं । 
  8. साइबेरिया में वैली आफ गीज़र्ज़ नामक एक तंग घाटी है । इस घाटी की खोज सन १ ९ ४ १ में हुई ।  यहाँ  २ ० ऐसे गीज़र हैं , जिनसे रंग  रंग बिरंगे फव्वारे छूटते हैं । यह सभी फव्वारे नियमित अंतराल पर छूटते हैं । अगर कोई फव्वारा दस मिनट के अंतराल पर छूटता है तो इस दस मिनट के कभी अंतर नहीं आया । इस घाटी  के सबसे बड़े फव्वारे को " फर्स्ट बॉन " कहते हैं । यह जब निकलता है तो ४ ० फुट ऊँचे स्तम्भ का निर्माण करता है । इस से  छिटकने वाली फुहारें ५ ० ० फुट ऊंचाई तक जाती हैं । यह दृश्य दर्शकों को काफी सुकून देते हैं । 
  9. लाफ निधि नामक एक विशाल झील है । इसके आस पास कोई मिलिट्री बेस नहीं है । इस झील के भीतर से थोड़ी थोड़ी देर के बाद तोप जैसी आवाजें आतीं है । जब आवाजें आती हैं तो झील का पानी तनिक भी नहीं उछलता , न ही कोई तरंग पैदा होती है । सदिओं से यह क्रम चलता आ रहा है । 

father and a son

एक बार की बात है कि एक गाँव में एक छोटा सा बालक अपने पिता के संग बहुत खुशहाल हालात में अपने घर आराम से रहता था . एक दिन बालक ने अपने पिता से शहर जाने के लिए कहा . पिता ने समझाया कि शहर अच्छा नहीं होता है . हम अपने गाँव में बहुत सुखी हैं , पर बालक अपनी जिद ठान कर बैठ गया . वह रोने लग गया , वह जिद कर कहने लगा कि शहर में मेला लगा है , सभी मित्रों ने देखा है . हम भी चलेंगे . आखिर पिता को मानना पड़ा , और वह अपने पुत्र को लेकर शहर पहुँच गया .                                                            बालक शहर की रंगीनियाँ देख कर बहुत खुश हुआ .                                                                                      इधर उधर घूमने के
बाद वे मेला देखने भी पहुँच गए . मेले में बहुत झूले थे , खाने को भी बहुत कुछ था . अपने पिता की उंगली पकड़े वह मेले का आनंद लेता रहा , जो कुछ भी वह मांगता पिता लेकर देता रहा . उसे इतनी ख़ुशी पहले कभी नहीं मिली थी . वह इस ख़ुशी में इतना रम गया कि उसे होश ही न रहा कि कब पिता की उंगली छूट गयी . मेले की मस्ती में मस्त , कुछ देर बाद उसे महसूस हुआ कि उस से पिता की उंगली छूट गई थी . अब  उसे रोना आ गया कि वह पिता को कहाँ ढूंढे . सारी रंगीनियाँ वहीँ थी , झूले भी वहीँ थे , खाने पीने का सब सामान वहीँ था , पर उसका रोना बंद नहीं हो रहा था . कुछ ही पलों में उसकी सारी ख़ुशी खत्म हो गयी , कारण ? पिता की ऊँगली  का छूट जाना .                                                                                                          दूसरी तरफ पिता भी दुखी था . उसका पुत्र खो गया था .अब पिता भी पुत्र को खोजने लगा . काफी देर के बाद पिता ने अपने पुत्र को खोज निकाला . अब उसके पुत्र को भी ख़ुशी हुई , कि पिता से उसका पुन: मिलन हो गया .                        इसी प्रकार से हम सभी जीव आत्माएं यहाँ इस संसार में , इस संसार कि रंगीनियो में इतना खो चुके है कि हमें अपने आप का कोई होश नहीं है . होश में वही होता है जिसे यह आभास हो जाता है कि उस से पिता की उंगली छूट चुकी है और वह पिता की खोज शुरू करता . जब हम उसकी खोज शुरू करतें है तब वह भी हमारी खोज शुरू करता है , यानि कि वह हमे सही मार्ग पर चलने में मददगार बनता है .                            हम उसे कभी नहीं ढूँढ सकते , वह ही हमें ढूँढता है . पर शुरुआत हमें ही करनी होती है .    इसी लिए हजरत ईसा ने भी कहा कि तुम खटखटाओ , द्वार तुम्हारे लिए खोला जायेगा . बाबा नानक ने भी कहा है कि तुम उसकी  तरफ एक कदम बढायो वह हज़ार कदम आगे होकर तुम्हे लेने आता है                              .धन्यवाद