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Monday, March 04, 2019

Lovers of god ( प्रभु को प्यार करने वाले ।)

एक मोची बेहद गरीब था , उसकी पत्नी वेश्या थी ।
और उसका एक ही बेटा था जो कि प्रभु से बहुत प्रेम करता था ।
एक दिन वह मोची घर जल्दी आ गया तो देखा कि उसका बेटा बन्दगी में  बैठा है । वह मोची क्रोध से भर गया और हाथ में पकड़ी हुई शराब की बोतल उसके सिर पर दे मारी । बेटे का सारा सिर खून और शराब से भर गया और उसकी एक आंख खत्म हो गयी । उसे आवाज़ आई कि " ए नोजवान , उठो , घबराओ नही , बन्दगी न छोड़ना , तुम इसी एक आंख वाले बन कर सबके दिलों पर राज़ करोगे ।"  और उसने बन्दगी नहीं छोड़ी ।
उसका नाम एक आंख वाला खान पड़ गया । वह लोगों को प्रभु की बातें सुनाने लग गया । जब वह बोलता तो चिड़ियाँ चहचहाना बन्द कर देती थीं । उसे सुनने के लिए लोगों की भीड़ बढ़ने लगी ।
उस जगह का राजा काफी उम्र का हो चला था । उसकी कोई संतान न थी । वह अपने उत्तराधिकारी की तलाश में था । उस राजा ने उस एक आंख वाले का नाम सुन रखा था । राजा ने उसे बुला भेजा । और साथ ही अपने कुछ वज़ीरों की भी बुलाया । सभी उसके पास बैठ गए । राजा ने वजीरों को अपने दिल की बात बताते हुए कहा कि उसने अपना उत्तराधिकारी चुनने ही आप सभी को बुलाया है । आप सभी ने जो भी अच्छा काम इस राज्य के लिए किया है , बयां करें । एक आंख वाला भी वहीँ था और वो दिलों की जानने का गुण रखता था ।
सबसे पहले उसने खज़ाना वज़ीर से उसकी क़ाबलियत पूछी तो उसने जवाब में कहा कि उसने ख़ज़ाने में धन दौलत भरी है । सोने चांदी से भरपूर कर दिया है ।
तब राजा ने पूछा कि , " यह बताओ कि गरीब अब तक गरीब क्यों और भिखारी अब तक भिखारी क्यों है ? "
" शायद अल्लाह को यही मंज़ूर है । "
इसके बाद मुख्य काज़ी ( कानून मंत्री कह सकते हो )
ने कहा " मैंने मुल्क में सारे बन्दोबस्त ठीक किये हैं और कई नए कानून भी बनाए हैं । "
" तो फिर गरीब की फरियाद क्यों नहीं सुनी जाती ? ",
" शायद अल्लाह को यही मंज़ूर है ।"
अब मौलवी जी बोले , " मैने सभी मसजिदों का बंदोबस्त ठीक किया है "
" तो फिर लोग मस्जिद में जाकर मौलवियों की नसीहतें सुनने की बजाए एक आंख वाले को सुनना क्यों ज्यादा पसंद करते हैं ।
अंत में राजा ने एक आंख वाले से पूछा कि इनमें से राजा बनने की क़ाबलियत किसमें है ?
एक आंख वाले ने अपने अंदर की आवाज़ सुन कर जवाब दिया कि , " मैं कहता हूँ कि हर कोई अपने अंदर की दौलत ( खुदाई ) से मालामाल होता है न कि व्यापार और कर ( टैक्स ) लगाने से ।
" मेरा कहना है कि आपकी प्रजा अल्लाह के इश्क के कानून से शांति हासिल करती है न कि सिपाहियों के कौडों और जंज़ीरों से ।"
मेरा कहना है कि " हर कोई अपने मस्तक में गूंज रहे इलाही संगीत की धुनों से शांति हासिल करता है न कि मस्जिद में घुटने टेकने से । "
अब तीनों वज़ीर उसे मारने को लपके तो राजा ने उन्हें रोकते हुए कहा , " इसकी पूरी बात सुनी जाए ।"
" हर व्यक्ति को खुदा बराबर का प्यार देता है , किसी को कम या ज्यादा नही ।" 
तीनों वज़ीर उसका जवाब सुन आग बबूला हो गए और उसे पीटने कर लिया लपके ।
तब राजा ने कड़क आवाज़ में कहा , " मैं इसे अपना उत्तराधिकारी बनाता हूँ । यह अभी इसी वक्त से राजा है ।"
अब वज़ीरों ने कहा " महाराज , यह एक मोची का बेटा है और इसकी माँ एक वेश्या है " ।
" पर अब यह मेरा बेटा और तुम्हारा राजा होगा । "
वह एक आंख वाला केवल इस लिये राजा बन गया कि वह अपने अंदर की आवाज़ को सुनता था । वह अंदर से प्रकाश से भरपूर था ।
.
आप सोचो कि प्रभु से प्यार करने वाले को वह बाहर से तो मालामाल करता ही है और भीतर से अपनी दौलत से भी भरपूर कर देता है । तो क्या आपको अपनी दौलत से भरपूर न करेगा ?
सोचो नही , बन्दगी करो । समय व्यर्थ न हो ।

Sunday, April 07, 2013

master & his disciple

हज़रत निजाम्मुद्दीन औलिया जी एक शिष्य था ,  उस शिष्य का नाम था अबुल हसन यमीनुद्दीन था । औलिया साहिब का एक शिष्य बेहद धनवान था . पैसा तथा जमीन जायदाद की कोई कमी न थी . वह धनवान व्यापारी था जो कि यहाँ से सस्ता सामान ऊन्ठों पर लाद कर अफ़ग़ानिस्तान तथा उससे भी आगे के देशों में ले जाकर बेचता तथा वहां से मिलने वाला सस्ता सामान यहाँ लाकर बेचता , यानि कि उसका आयात -निर्यात का कारोबार था 
एक दिन की बात है कि औलिया साहिब का एक शिष्य उनके पास . वह शिष्य बेहद गरीबी से जूझ रहा था . उसकी बेटी की शादी तय हो चुकी पर शादी पर खर्च करने लायक पैसों का इंतजाम न हो पाया था . औलिया साहिब के पास बहुत उम्मीद लेकर पहुंचा था वह . शिष्य ने आकर मदद के लिए फ़रियाद की . औलिया साहेब के पास उन दिनों तंगहाली चल रही थी . वह बड़ी मुश्किल से अपने लिए खाने इत्यादि का इंतजाम कर पा रहे थे . औलिया साहिब ने उसे कुछ रुकने की सलाह दी , क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि कहीं न कहीं से इंतजाम हो ही जायेगा . उनके पास कई शिष्य आते थे जो कि उनकी सेवा में कोई न कोई भेंट दिया करते थे . इसी उम्मीद पर ही उन्हों ने शिष्य को रुकने की सलाह दी पर होना तो कुछ और ही था . जब शादी को कुछ ही दिन रह गए तब शिष्य ने वापिस जाने की आज्ञा मांगी . शिष्य  बहुत दुखी क्योंकि उसने देखा कि औलिया साहिब बहुत मश्किल में अपने लिए ही इंतजाम कर पा रहे थे . औलिया साहिब भी बहुत परेशान थे , क्योंकि चाहते हुए भी उस शिष्य की मदद न कर पा रहे थे . शिष्य द्वारा जाने की आज्ञा मांगने पर वह उसे और रुकने को भी नहीं कह पा रहे थे क्योंकि शादी को कुछ ही दिन शेष थे . 
शिष्य वापिस चलने को तैयार हो गया तो औलिया साहिब ने उससे मदद न कर पाने के लिए माफ़ी मांगी तथा कहा ," मेरे पास तुझे देने को कुछ भी नहीं है , पर तू  खाली हाथ न जा , तू बहुत उम्मीद लेकर मुर्शिद के दरवाज़े पर आया है . इस वक़्त मेरे पास मेरे ये जूते ही हैं , तू इसी को ले जा , खुदा  तेरा मददगार होगा ." औलिया साहिब ने वे जूते उतार कर शिष्य के हाथ में दे दिए . जूते जगह जगह से कटे फटे थे , जो कि पहनने लायक भी न थे .  शिष्य ने जूते लेकर बड़े बे मन से अपने थैले में रख लिए और चल दिया अपने गावं की और . 

शिष्य को चलते चलते एक दो दिन ही हुए होंगे अभी उसका गावं दूर था । 
दूसरी तरफ औलिया साहिब का धनवान शिष्य इक्कीस उन्ठों पर काजू, बादाम , मेवे इत्यादि लाद कर अफगानिस्तान से आ रहा था .  उसे हल्की हल्की खुशबु सी महसूस हो रही थी . उसका ध्यान खुशबु की तरफ आकृष्ट हो रहा था . उसने खुशबु को पहचानने की कौशिश की तो उसे महसूस हुआ , "कि खुशबु तो मेरे मुर्शिद की ही लग रही है ." जैसे जैसे उसका काफिला आगे - आगे बढ़ रहा  था खुशबु भी बढती जा रही थी . उसके मन में मस्ती छाने लगी . अपने मुर्शिद [गुरु ]के प्रति प्रेम जाग उठा और उसका मन मयूर की तरह नाचने लग गया  . अश्रुधारा बह उठी . वह गरीब  शिष्य जो की औलिया साहिब के दर से आ रहा था वह उसी काफिले के पास से गुज़र रहा था वह थोडा आगे बढ़ा तो धनवान शिष्य ने महसूस किया कि खुशबु घटने लग रही है . वह समझ गया कि यह जो फटेहाल पास से गुज़रा है , यह खुशबु वहीँ से आ रही है . उसने काफिला रुकवा लिया और भागता हुआ उसी फटेहाल गरीब व्यक़्ति के पास पहुँच गया . अब वहां ऐसा लगने लगा जैसे खुशबु का  सैलाब ही आ गया हो उस धनवान की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी . मुर्शिद के प्रति प्रेम का अथाह सागर हिलोर उठा उसने दोनों हाथ जोड़ कर उस फटेहाल व्यक़्ति से पूछा , " आप कहाँ से आ रहे हो ? " 
" मैं अपने मुर्शिद के दर से आ रहा हूँ ". 
" मुर्शिद " शब्द सुनते ही वह धनवान आनंद से झूम और पूछा , " कौन हैं आपके मुर्शिद ? "
उसने जवाब दिया , " औलिया साहिब हैं , उनका नाम है निजाम्मुद्दीन साहिब  है ".
अब क्या था , उस धनवान व्यापारी को अपना गुरु भाई मिला और वह प्रसन्ता से झूम उठा .व्यापारी ने उसे अपने गले से लगा लिया और वहां का हाल जानने को कई सवाल किये . . उस शिष्य से यह  जानकर कि मुर्शिद तो बहुत ही तंगहाली से दिन काट रहे हैं , वह बहुत दुखी हुआ . उसे अपने पर बहुत लाज आयी , मन ने कहा , " धिक्कार है मुझ पर कि मैं तो मजे से हूँ और मेरा मुर्शिद ---------"मेरा मुर्शिद मेरे इस गरीब गुरु भाई की मदद भी न कर सके . उसकी रूह काँप उठी उसने अपने गरीब गुरु भाई से पुछा ," क्या ये जूते आप मुझे देंगे " ? अब वह गरीब गुरु भाई सोचने लगा कि ," मेरे तो किसी काम के नहीं  , न ये पहनने लायक और न ही ये बिकने वाले , इसी को दे देता हूँ , मुझसे तो इनकी संभाल भी हो सकेगी  फिर ये है भी श्रद्धावान ।" . यह सॉच कर उसने जूते अमीर के हवाले कर दिए . जूते पाकर वह धनवान व्यापारी नाचने लग गया . उसने जूते अपने सर पर रखे , कई बार उन्हें चूमा और अपने उस गरीब गुरु भाई से कहा ," मैं तो आपका यह क़र्ज़ कभी उतार ही न पाऊंगा , मैं अपनी सारी दौलत  भी अगर इन जूतों के बदले में दे दूं तो भी आपका क़र्ज़ मुझसे न उतर पायेगा . इस वक़्त मेरे पास इक्कीस उन्ठों पर बादाम मेवे इत्यादि लदे  हैं . इनमे से मैं आपको बीस ऊंट दे रहा , आप इन्हें कबूल करें " .और उस धनवान ने लाखों के सामान सहित बीस ऊँट अपने गरीब गुरु भाई के हवाले कर दिए .
अब एक ऊँट सामान सहित लेकर तथा मुर्शिद के जूते अपने सर पर रखे वह गुरु के गुण गाता हुआ वह अपने गुरु हज़रत निजाम्मुद्दीन औलिया साहिब जी के पास पहुँच गया . एक ऊंट सामान सहित गुरु को भेंट किया तथा उनके जूते उनके सामने रख दिए 
मुर्शिद के पूछने पर उस धनवान शिष्य ने रास्ते में गुजरी पूरी दास्तान सुना दी . पूरी बात सुन कर औलिया साहिब ने कहा " यह जूते तो तूने बहुत सस्ते में ले लिए हैं ,तू दौलत से तो अमीर है ही तू दिल से भी अमीर है , चल आ बैठ मेरे सामने , आज मैं तेरे को आत्मा से भी अमीर बना दूं , आज मैं तुझे वह दौलत देता हूँ जो कभी ख़त्म ही न होगी . बांटे जाना इस दौलत को , जैसे जैसे बांटेगा ,यह दौलत बढती ही जाएगी  . उन्होंने उस शिष्य को अपने सामने बैठाया और परमात्मा के घर की दौलत से मालामाल कर दिया 
" तू आज असली अमीर हुआ है , दुनिया की सारी अमीरी यहीं रह जाएगी पर जो अमीरी मैंने तुझे दी है यह तेरे साथ ही जाएगी अब तुझ में और मुझमे कोई फर्क नहीं रहा अब हम दोनों एक ही हैं . पहला जो तेरा नाम ,इस शरीर को मिला वह तेरे माता पिता ने दिया था . मैं आज तुझे नया नाम दे रहा हूँ ,दुनिया में तू इसी नाम से याद किया जायेगा . और जो नाम औलिया साहिब ने उसे दिया , वह शिष्य आज तक उसी नाम से जाना जाता है और वह नाम आज तक लोगों की जुबान पर है .
अमीर खुसरो नाम दिया गया मुर्शिद के द्वारा .







Sunday, March 17, 2013

father and a son

एक बार की बात है कि एक गाँव में एक छोटा सा बालक अपने पिता के संग बहुत खुशहाल हालात में अपने घर आराम से रहता था . एक दिन बालक ने अपने पिता से शहर जाने के लिए कहा . पिता ने समझाया कि शहर अच्छा नहीं होता है . हम अपने गाँव में बहुत सुखी हैं , पर बालक अपनी जिद ठान कर बैठ गया . वह रोने लग गया , वह जिद कर कहने लगा कि शहर में मेला लगा है , सभी मित्रों ने देखा है . हम भी चलेंगे . आखिर पिता को मानना पड़ा , और वह अपने पुत्र को लेकर शहर पहुँच गया .                                                            बालक शहर की रंगीनियाँ देख कर बहुत खुश हुआ .                                                                                      इधर उधर घूमने के
बाद वे मेला देखने भी पहुँच गए . मेले में बहुत झूले थे , खाने को भी बहुत कुछ था . अपने पिता की उंगली पकड़े वह मेले का आनंद लेता रहा , जो कुछ भी वह मांगता पिता लेकर देता रहा . उसे इतनी ख़ुशी पहले कभी नहीं मिली थी . वह इस ख़ुशी में इतना रम गया कि उसे होश ही न रहा कि कब पिता की उंगली छूट गयी . मेले की मस्ती में मस्त , कुछ देर बाद उसे महसूस हुआ कि उस से पिता की उंगली छूट गई थी . अब  उसे रोना आ गया कि वह पिता को कहाँ ढूंढे . सारी रंगीनियाँ वहीँ थी , झूले भी वहीँ थे , खाने पीने का सब सामान वहीँ था , पर उसका रोना बंद नहीं हो रहा था . कुछ ही पलों में उसकी सारी ख़ुशी खत्म हो गयी , कारण ? पिता की ऊँगली  का छूट जाना .                                                                                                          दूसरी तरफ पिता भी दुखी था . उसका पुत्र खो गया था .अब पिता भी पुत्र को खोजने लगा . काफी देर के बाद पिता ने अपने पुत्र को खोज निकाला . अब उसके पुत्र को भी ख़ुशी हुई , कि पिता से उसका पुन: मिलन हो गया .                        इसी प्रकार से हम सभी जीव आत्माएं यहाँ इस संसार में , इस संसार कि रंगीनियो में इतना खो चुके है कि हमें अपने आप का कोई होश नहीं है . होश में वही होता है जिसे यह आभास हो जाता है कि उस से पिता की उंगली छूट चुकी है और वह पिता की खोज शुरू करता . जब हम उसकी खोज शुरू करतें है तब वह भी हमारी खोज शुरू करता है , यानि कि वह हमे सही मार्ग पर चलने में मददगार बनता है .                            हम उसे कभी नहीं ढूँढ सकते , वह ही हमें ढूँढता है . पर शुरुआत हमें ही करनी होती है .    इसी लिए हजरत ईसा ने भी कहा कि तुम खटखटाओ , द्वार तुम्हारे लिए खोला जायेगा . बाबा नानक ने भी कहा है कि तुम उसकी  तरफ एक कदम बढायो वह हज़ार कदम आगे होकर तुम्हे लेने आता है                              .धन्यवाद